Saturday, November 24, 2007

एक दोपहर

एक दोपहर

बहता रहता है
बहता रहता है
खेतों व खलिहानों में एक शाश्वत विचार
सौन्दर्य के वातायन पर बैठा है एक श्वेत हंस
गतिशील हैं कल्पनाओं के दृश्य क्रमबद्ध
संगीत में उतर गया है समूचा भूतल
दोपहर है
मन्द हास में डूबा प्रकृति का तृण तृण
नील ज्योति बिखरा कर उड़ता है एक नीलकंठ
अरहर के पौधे सो जाते हैं पवन संग
मैं हूँ विचलित
क्योंकि निहार नहीं पाता
सम्पूर्ण सौन्दर्य
दिवाकर की भांति सृष्टि का।

पुस्तकालय के समीप

पुस्तकालय के समीप
तेज हवा चलती है
तेज तूफान की तरह
फुहारों की तरह सिर पर मारती है मार।
बेलों पर लगी फुनगियाँ उड़ रही हैं अलकों के ऊपर।
उदास धूप, फैलती हुई मुस्कराहटॉं से हँस रही है।
कारीडोर के ऊपर
खम्भों की मार से व्यथित
गुलाबी फूलों से लदी लतिकाओं में
उदासीनता है अपने अस्तित्व पर।
लम्बी कारीडोर एक नारी की तरह है
जिसकी नाक में स्वर्ण नथ है
कान मैं रजत बालियाँ
होठों पर बैगनी लिपिस्टिक
रंग बिरंगे बेलबूटों की हरी साड़ी में है नृत्यलीन।
पुस्तकालय का ललाट बुद्धिजीवियों की तरह बड़ा व चौड़ा है।
छछूँदर जैसे तेजी से चढ़ जाती है दरख्त पर
एसे ही उठ रहे हैं मेरे विचार
और जैसे एक नटखट बालिका
कारीडोर पर चलते हुए तोड़ लेती है पुष्प
एसे ही कट जाती है मेरी अनुभूति।
हवा की गति मेरी कविता है
और कमर हिलाते पौधे मेरी कविता के शब्द।
कोशिश कर रहा हूँ
समूचे दृश्य को आकार देने की
परंतु मेरी कोशिश है निरर्थक।

लाल कंगन

लाल कंगन


धूप पुल पर से उतर रही है
नदी के उस पार
विहगों का एक झुंड चह्चहा रहा है
सुबह से कई मुर्दे इस घाट से
नदी अंतराल बहाये जा चुके हैं
न जाने कितने लोगों ने गंगा स्नान किया है
मैं दरख्तों के बीच से
क्षितिज पर सूर्य को डूबते देखता हूँ
मुझको लगता है यह सब एक ही कहानी का अंत है
इस कहानी में मुझको यह और जोड़ना है
मैं कगार पर गिरे फूलों व दूर फूस पर स्थित
लाल कंगन को देख कर व्यग्र हूँ।

दौड़ने लगा संतरे के बागों की ओर।

धानी नदी के जल में
स्नान के बाद
ज्योंही मैं निकला
एक धमाका हुआ
खरगोश व हिरन दौड़ने लगे
एक और धमाका हुआ
गायें व बकरियाँ दौड़ने लगीं
एक और धमाका हुआ
श्वान,सियार व लौमड़ियाँ दौड़ने लगीं
मैं उस शिकारी को खोज रहा था
जिसके हाथ की बन्दूक से
जंगल आतंकित हो गया था
तभी
मैंने घोड़ों पर शिकारियों को
अपनी और आते हुए देखा
मैंने जल्दी जल्दी कपड़े पहने
और दौड़ने लगा संतरे के बागों की ओर।

उसकी मंगनी टूट गई थी।

मैंने कुछ दिनों से उसको अत्यंत उदास देखा। फूलों की तरह हंसी बिखेरती हुई वह घूमा करती थी।अचानक उसमें परिवर्तन आया और उसका गुलाब सा चेहरा मुरझाया हुआ रहने लगा।उसकी बोली में मधु था परंतु वह अब पीड़ा भरी बोली बोला करती।उसका स्वर संगीत की तरह उफनता न था वरन श्मशान की तरह शांत व हलका रहने लगा।उसके पैरों की गति में दौर्बल्य था । शरीर में अचानक शिथिलता आ गई थी।उसके चंचल नयन देखा न करते वरन लगता भीतर ही भीतर अपने अंतर्मन में झांक रहे हों।मेरे मन में उसके परिवर्तन को लेकर कुतूहल हुआ। उसकी मंगनी टूट गई थी।

सौन्दर्य

मैं और मेरा एक मित्र नहर के किनारे घूमने निकलते हैं।आगे एक पुलिया आती है और उससे सटे एक वृक्ष पर बया के चार घोंसले लटके होते है। मैं कहता हूँ कितने सुन्दर है आश्च्रर्य होता है इनकी कार्य कुशलता पर और कला परख दृष्टि पर।वह कहता है ये निश्चय ही अति सुन्दर हैं और मैं उनको अपने कमरे में लगाऊँगा। मैं उसको रोकता हूँ तुम ऐसा नहीं कर सकते। परंतु वह तेजी से वृक्ष के समीप पहुँच जाता है ,सभी पक्षी घोंसले से बाहर निकल कर क्रन्दन करते हैं।वह एक एक कर सभी घोंसले तोड़ लेता है। पक्षी चिल्लाना बन्द कर देते हैं और एक टक उसकी ओर निर्मूक दृष्टिदेखते रहते हैं। मैंने उसको कहा तुम्हारा यह कार्य निर्दयता पूर्ण है।वह चारों घोंसले हाथ में थामे लौटता है।परंतु वे पक्षी करुण नेत्र उसको देखते रहते हैं।
मैं अब जब भी उसके कमरे में जाता हूँ मुझको वे घोंसले सुन्दर नहीं लगते। मुझको लगता है सौन्दर्य का गूदा उनमें से निकल चुका है और वे केंचुल की भांति खाली खाली हैं।

नीलकण्ठ

एक सुन्दर पक्षी नीलकण्ठ वृक्षों के पास की दीवार पर बैठता है ।वह मौन बैठा रहताहै।एक कौआ आता है और उस दीवार पर दूर बैठ जाता है।कौआ धीरे धीरे नीलकण्ठ के समीप खिसकता जाता है। नीलकण्ठ मौन उसको निहारता रहता है। कौआ और पास आकर उससे सटकने की कोशिश करता है।नीलकण्ठ उछल कर दूर बैठ जाता है। क्रुद्ध कौआ तब नीलकण्ठ के पंखो पर अपनी चोंच मारता है।बेचारा पक्षी कातर दृष्टि से कौवे की ओर देखता है।कौआ नीलकण्ठ को असहाय समझ कर उसके पंखो पर लगातार चोंच मारता है। वह कौवे की धृष्टता से बचने के लिए और कोई रास्ता स्वयं को बचाने का न पाकर उड़कर एक वृक्ष की लचकती डाली पर बैठ जाता है।
सज्जन व्यक्ति दुर्जनों से इसी प्रकार छुटकारा पाते हैं।

दया

मेरे कमरे की छत पर शरद में ठंड से ठुठरती मक्खियाँ हर रात्रि को बसेरा डाल लेती थीं। सुबह होता था ,पक्षियाँ चहचहाने लगती थीं।दो पक्षी कमरे के रोशनदान से आकर मक्खियों पर युद्ध छेड़ देते थे।बेचारी मक्खियाँ नम परों से उड़ भी न सकती थीं और आत्मसमर्पित सी उन पक्षियों की चोंच में चली जाती थीं।मुझको उन मक्खियों पर बहुत दया आती थी।
अब बसंत है धूप तेज निकलती है वे पक्षी अब भी उसी समय आते हैं और छत की दीवार पर बार बार चोंच मारते हैं परंतु मक्खियाँ अब फुर्र से उड़ जाती हैं। पक्षी अपने सिर को इधर उधर चारों ओर घुमाकर देखते हैं और चोंच मारने की पुनरावृत्ति होती है परंतु शिकार को नहीं पा पाते।
अब मुझको उनकी कुँठा पर तरस आता है।

मनुष्य तू गतिमय है

मनुष्य ! तू गतिमय है।गति ही जीवन का लक्ष्य है। गति का तेज होना या मंथर होना गति की विशेषता है।अपनी मंथर गति पर शोक मत कर।जल में लहर उतार चढ़ाव के साथ चलती हैं।यह उतार चढ़ाव भी लहरों की विशेषता है।यह भी सम्भव है लहरों का पथ कोई दुष्ट भँवर अवरुद्ध कर ले या कोई वाचाल किनारा लहरों की गति को कुछ समय के लिए रोक ले परंतु फिर भी लहरें आगे बढ़ने का प्रयत्न करती हैं या आगे बढ़ने के लिये अन्य पथ ढ़ूढ़ती हैं इस प्रयत्न में लहरों को वापिस लौटना पड़ सकता है। लहरों के वापस लौटने या डूब कर विलीन होने में कोई अपमान नहीं है।आगे न बढ़ने पर शोक न कर।यह न देख कितना आगे बढ़ता है। देखना है कि गति के लिए प्रयत्न तो बन्द नहीं कर दिया। गतिशीलता ही सर्वोच्च विकास है।गतिशील रहना ही सर्वोत्तम लक्ष्य है।

प्रश्न करती प्रतीत होती है

वह धूल और मैल से लिप्त बालों की गाँठ के साथ ,अपने नंगे हाथों से बालों को खुजाते हुए जिसकी बगलों पर खाज के चितकबरे बने है और सड़ी दुर्गन्ध आ रही है , हाथ में मैले कपड़ों का गट्ठर उठाये हुए ,एक छोटा सा दुकूल कमर पर रस्सी के समान कपड़े से बंधा है, सामने के आधे हिस्से पर है जो उसके चलने पर जांघों की गति के साथ छणिक समय के लिये गुप्तांगों को आवरणहीन कर देता है ,नितम्ब पूर्ण रूप से खुला है, एक राजसी चाल से मशहूर कानपुर शहर के प्लेटफार्म नम्बर एक पर ,भले व सभ्य घराने के यात्रिओं के बीच से लज्जित करती हुई क्रूर हास्य भाव से निर्भय घूम रही है। संसार के प्रति नेत्रों में घृणा भाव है।वह देश के सभ्य समाज से प्रश्न करती प्रतीत होती है संसार के द्वारा फैंकी हुई ,समाज में अत्यंत पतित व घृणित कही जाने वाली ,भले ही उसने चोरी ,क्रूर हिंसा या वैश्यावृत्ति की हो ,उस दार्शनिक के सामान्य मानव की तरह जीने के लिए क्या उपादान है ? या क्या साधन प्रदान करता है?

सुबह से गीतों की बदली छायीहै

सुबह से गीतों की बदली छायीहै





सुबह से गीतों की बदली छायीहै
शब्दों की इन अनजान पीर भरी लहरों पर
कोई रात्रि का राजकुमार
बेखबर सोया है
बेहद आकर्षक है राजकुमार
उत्कट इच्छायें लिए हुए आँखों में
एक अनजानी राजकुमारी
गीत की लय छेड़ती है ।
सुबह से गीतों की बदली छायीहै
मेहदी व महावर से रची सजी
गुलाब की पालकी बनाकर
बेला,चमेली,जुही व गुलमुहर के फूलों के
गजरे सजाकर आयी है
यह स्वप्निल चेहरे की राजकुमारी।
सुबह से गीतों की बदली छायीहै
इस मादक पवन के उजास में
राजकुमार बेखबर सोया है
नहीं जानता
सुदूर यात्रायें कर उसको पर्वतों के पार
अनेक साहसिक कारनामों में
परीक्षा देनी है
और उसको सफल होना है
सुबह से गीतों की बदली छायीहै
सौन्दर्य की इस मधुमास वेला को
परंतु वह
सारा का सारा स्वयं में समेट लेना चाहता है।

प्रिय टूटी तमन्नाओं का चाँद बन कर चली आ

प्रिय टूटी तमन्नाओं का चाँद बन कर चली आ

प्रिय टूटी तमन्नाओं का चाँद बन कर चली आ
पंक का पंकज है उजड़े दिलों का गीत बन कर चली आ
अनगिनत सितारों में खोजा है मेरा मीत बन कर चली आ
अब हो चला दिल मेरा बेबस अरमान बन कर चली आ
प्रतीक्षारत नेत्र श्रांत समय बन कर चली आ
कैसे हैं कदम सुगन्ध बन कर चली आ
परी है, देवी है, पवन है ,क्या है, सम्प्रति चली आ।

टूट गया मन का आसरा

टूट गया मन का आसरा

टूट गया मन का आसरा
रात होगई बात क्या
उदास मन का बहलाव क्या
मैंने कितने स्वप्न सजाए
मेरी सारी दुनिया उजड़ी
जिसको पाया उसको खोया
कितनी प्रतीक्षा अरमान क्या
मन का मुझको मीत न मिला
प्यार का बोलो जवाब क्या
मैंने सारी निधियाँ खो दी
रात होगई बात क्या।

अपनी बाहों का सहारा दे दो

अपनी बाहों का सहारा दे दो
अपनी बाहों का सहारा दे दो
मेरा टूटा जीवन जुड़ जाये
अपना सुन्दर उपवन
मैंने अपने हाथों उजाड़ा है
अभिलाषाओं का महल बनाया था
अपने हाथों गिराया है
मैंने नीले फूलों की राजकुमारी
की तमन्ना की थी
यही वह जगह है जहाँ
मैंने सबकुछ खोया है
मुझको मेरा प्यार वापिस कर दो
मैं अपना बगीचा बना लूँ
अपनी बाहों का सहारा दे दो
मेरा टूटा जीवन जुड़ जाये
अपनी बाहों का सहारा दे दो
मेरा टूटा जीवन जुड़ जाये

मैं नदी के मंझधार

मैं नदी के मंझधार
मैं नदी के मंझधार में
खड़ा हो प्यार का गीत लिखता हूँ
देखता हूँ
हर तरफ तेरा रूप ही दिखलायी देता है
जब जल लहरों पर
दिनकर की रश्मिपुंज पड़ती हैं
लगता है तेरे चेहरे की सुहावनी मुस्कराहट फैल गई हो
नदी के दूसरे छोर
पर दरख्तों का समूह है
उनमे है तेरी गहन उजली संभली केशों की छटा
मेरे सामने चमकते हुए विशालकाय सूरज में है
तेरा ललाट
नभ पर सफेद विहगों की पाँत
बनी है तेरी तरुण माँग
वायु झोंको के साथ उठता हुआ
सफेद बालू का गुबार
करता है तेरी विशालकाय जाँघ अनावृत
जल के बीचोंबीच पृथ्वी
की गोलाकार आकृति बनी है
सुप्त नितम्बों की छवि
विशाल जल का फैलाव है नदी का
तेरा सुकोमल वक्षस्थल
हे सौन्दर्य देवी
मैने तुझको प्रकृति कीगोद में पा लिया है क्रीणामग्ननदी के मंझधार में
खड़ा हो मैं तेरा गीत लिखता हूँ।

अगर तुम साथ होती

अगर तुम साथ होती
अगर तुम साथ होती
कगार पर बहार आ जाती
सौन्दर्य का मुखटा खुल जाता
प्यार की चाँदनी शरमा जाती
सितारे नभ पर क्रीणा करने लगते
चाँद के ओठों पर बिजलियाँ चमकती
अगर तुम साथ होती
अगर तुम साथ होती

नदी का किनारा

नदी का किनारा
नदी का किनारा
मस्ती भरी हवा है
हँसो की जोड़ी
स्वर्ग सी जगह है
मैं हूँ कितना अकेला
जैसे कटता किनारा
दुपहरी का सूरज
जल की बहती ठँड़ी धारा
कैसे गुजरे दिन
अगर जल करें अठखेली
मछुआरे जाने को हैं
दिल कहता
मैं हुआ तुम्हारा
न भी आओ तुम
फिर क्या
चाँद हमारा है
नदी का किनारा
मस्ती भरी हवा है।

मेरे जीवन की सूनी कुटिया में तुम न आना

मेरे जीवन की सूनी कुटिया में तुम न आना
मेरे जीवन की सूनी कुटिया में तुम न आना
दुख बना मेरा साथी
सुख नहीं मेरा साथी
परिचय की दीवार तोड़ तुम न समझाना
मेरे जीवन की सूनी कुटिया में तुम न आना
मैं स्वतंत्र उद्विग्न राही
कोई बंधन स्वीकार नहीं
नीरव वन में मेरे स्वप्न प्रसूनों पर न छा जाना
मेरे जीवन की सूनी कुटिया में तुम न आना
स्मिति टूटेगी तेरी
सुकोमल पंखुड़ी सूखेगी
जीवन की उदास रातों में मेरी तुम न आना
मेरे जीवन की सूनी कुटिया में तुम न आना ।

न जाने कैसी यह मस्ती छायी

न जाने कैसी यह मस्ती छायी

न जाने कैसी यह मस्ती छायी
न जाने वीरान में भँवर कहाँ से आया
इठला रहा है खुशी से वह शाख पर
न जाने कैसी यह बहार आयी
पलकों में भरी है नशीली खुशबू
न जाने किसने यौवन को रंग दिया
गर्दिश के दिन पर खुशी के गीत
गा रहा है न जाने कौन ?
उजड़े चमन में नृत्यमग्न हुआ मोर
यह मादक पवन यह अलबेली छटा
न जाने किसने प्यार को प्यार दिया है
जहान में कैसी यह रोशनी छायी ?

पथ के बच्चों के नाम

पथ के बच्चों के नाम

बसन्त पर फूल खिलते हैं कहते हैं यौवन के
आभूषणों से सजते हैं पौधे वस्त्र उतार जीर्ण
पके खेतों में विचरती हैं उल्लसित हो नारियाँ
अठखेलियाँ करती हैं चंचल गेहूँ की बालियाँ
भू को सजाती हैं सरसों आह्लाद से फूलकर
सन्देश अभिसार के देते हैं फाख्ता आ आकर
आशा देती है मन को कोयल कुहू कुहू कर
बोलता हर पल मेरा मन परन्तु विपद स्वर
कहाँ है इन बच्चों की उम्र का वसन्तोत्सव?
कहाँ आशा नव? सन्देश नव ? जीवन नव?
कब आयेगा? इन बच्चों का उत्थान दिवस
क्या लिखूँगा ? कभी मैं इनके गीत उलस

आज वेदना रोती

आज वेदना रोती

कम्पित स्वरों में आज वेदना रोती।
जब मन बेबस होजाता,
उर पर अंकुश न आता,
अपनों से पार न पाता,
जग कोलाहल के बीच,संवेदना सोती,
कम्पित स्वरों में आज वेदना रोती।
कभी हँसता, कभी रोता,
कभी रोता, कभी गाता,
असफलतायें बुनता जाता,
स्पृहणीय नहीं मैं, चेतना सोती,
कम्पित स्वरों में आज वेदना रोती।
विकल स्वर मौन कहता,
विपद स्वर कौन कहता,
नीर नद सम बहता जाता,
बादलों से चपला की आहट होती,
कम्पित स्वरों में आज वेदना रोती।

Friday, November 23, 2007

न जाने कैसी यह मस्ती छायी

न जाने कैसी यह मस्ती छायी

न जाने कैसी यह मस्ती छायी
न जाने वीरान में भँवर कहाँ से आया
इठला रहा है खुशी से वह शाख पर
न जाने कैसी यह बहार आयी
पलकों में भरी है नशीली खुशबू
न जाने किसने यौवन को रंग दिया
गर्दिश के दिन पर खुशी के गीत
गा रहा है न जाने कौन ?
उजड़े चमन में नृत्यमग्न हुआ मोर
यह मादक पवन यह अलबेली छटा
न जाने किसने प्यार को प्यार दिया है
जहान में कैसी यह रोशनी छायी ?

क्या भावना क्रीड़ा की मधुर शैली ?

क्या भावना क्रीड़ा की मधुर शैली ?


आवारा मन न जाने किधर विचरण करता
अंवेषक मन न जाने क्या खोजता रहता
चिर प्रतीक्षित नेत्र न जाने क्या निहारते
किंकर्तव्यविमूढ़ मनस क्या सोचता रहता
पुष्प अधखिले उद्विग्न अभिलाषा मृग मरीचका
विश्व स्वप्न क्या भावना सृष्टि क्रीड़ा की मधुर शैली ?

तुमने जोड़ दी है

तुमने जोड़ दी है
तुमने जोड़ दी है आज नभ पर एक और रात
अब तक मैं समझा था सितारों की रात होती है
नीली साड़ी , श्वेत मोती व चाँद सा मुखड़ा
अगर यह मस्त रात नहीं तो है क्या?

क्या कोई भुला सकता है वह प्रेम ?

क्या कोई भुला सकता है वह प्रेम ?
क्या कोई भुला सकता है वह प्रेम ?
जहाँ श्वास ,ओठ ,भावनायें ,शरीर व अपना सर्वस्व दिया हो
जहाँ गीत, मीत,स्वप्न, संगीत व अपना सर्वस्व खोया हो
जहाँ गति,हृदय ,चेतना,प्राण व उत्तेजना अवमानित की हो
जहाँ पुलक ,थिरकन, हँसी , स्मिति व लय कम की हो
जहाँ उँगलियाँ कम्पित,हृदय शंकित,व ओठ विकम्पित साहस किया हो
जहाँ लक्ष्य, फल,फूल, गुलाब व माधुर्य छोड़ दिया हो
वह अवरुद्ध हृदय से उमड़ता अगाध पारावार अब सीमाहीन हो अनंतता में फैल चुका हो क्या कोई भुला सकता है वह प्रेम ?

दिल में है मेरे तरंग

दिल में है मेरे तरंग

दिल में है मेरे तरंग तन में है उन्माद
प्राणों में नदी और हर श्वास में तेरा प्यार
हर स्वप्न में तेरी याद नींद में है तेरी छाप
हर गीत मधुर गीत गीतों में तेरा नाम
सागर से गहरा है पर्वतों से ऊँचा प्यार
अंतरिक्ष में न समाये एसा प्यार तेरा प्यार

टूट गया कहीं मेरा मिलन

टूट गया कहीं मेरा मिलन

टूट गया कहीं मेरा मिलन
छूट गया कहीं मेरा मन
सहारा था कोई आज न मिला
किनारा था कहीं आज ढह गया
बेरुख हुआ प्यार का अन्दाज़
नीरस हुयी जिन्दगी की हर बात
उम्मीदों में कहीं छिपी थी किरन
तिमिर में कहीं रखा था दीप
कहाँ मैं खड़ा था न जाने कहाँ
कहाँ मेरा पथ था न जाने कहाँ
टूट गया कहीं मेरा मिलन
छूट गया कहीं मेरा मन ।

छात्र

छात्र

क्यों दुखी हैं ये छात्र
उम्र कम है व अवसाद से घिरे हैं
झुधातुर हैं व शत जन्म प्यासे
किसी को कहीं त्रप्ति नहीं है।

तेरी आँखों में

तेरी आँखों में
तेरी आँखों में गुलनार का रंग
तेरे ओठों पर मोहब्बत के तार
तेरी बाहों में जुही का पागलपन
तेरा आँचल फूलों का पराग


तेरे कदम सरोद के सरगम
तेरी स्मृति गुल की महक
तेरी धड़कन में मेरे गीत
तेरी कल्पनायें अंगूर की शराब

तेरी चितवन रति का मादकपन
तेरी स्मिति जुगुनू की चमक
तेरा शबाब शुफुक की लाली
तू क्षितिज का विस्तार

तेरे कपोल कश्मीरी सेब
तेरे वक्ष पर आम की मिठास
तेरी जाँघ पर सुरमई तिल
तेरी देह गुदाज़ शाम


तेरा मिलन चाँदनी रात
तेरा विछोह भू पर दरार
तेरा अंतःकरण रंगीन गुलिस्ताँ
तेरा प्रेम स्वर्गिक ज़श्न।

निमंत्रणों में

निमंत्रणों में

निमंत्रणों में जीता मैं तेरी खुली बाहों के
तेरी मुस्कराहटों से मेरे पग बढ़ते हैं
निगाहों से कुछ एसी बातें होती
गीत लिखते तेरे होठों के ठिरकने से

तेर मुलायम अलकों के झटकने से
मस्तिष्क का संत्रास हट जाता है
तुमने नहीं बाँधा इस जूड़े को क्यों
मेरा स्वर खिज़ाओं में बहक जाता है

कितना आशियाना है तेरा मिज़ाज
चाहने वाले का प्याला भर देती हो
मदिरा मदिरा वह चिल्लाता है
मादकता से मग भर देती हो

तेरी खुली कलाई के व्युत्कृम घुमाव ने
तेरी गोरी बाहों ने सूनी निगाहों ने
मदहोश कर रखा है मन आशिक़ का
तन आशिक़ के बोल स्वर आशिक़ के
तेरे अंतर्मन की मधुर खुशबू ने
मायावी मन को भोला रूप दिया
धधकते हुए अंतर्द्वन्दित मानस को
शांत किया स्वसुबोध दिया

कितनी भंगिमाओं में मैं तुझको देखूँ
मदहोश नेत्र तुझे देख न पाये
समीप खड़ी सामने बैठी
ये नेत्र तुझे पहचान न पाये

मौन हुये हम बैठे रहे थे तब
अँधियारी रात्रि का होता था शोर
तुम तो मुस्काती थी मंद मंद
मुस्काती ओठों की कोर

रहस्यमयी बैठी रही तुम ,अव्यक्त
प्यार का कभी इज़हार न किया
प्याले पर प्याले भरे मदुरा के
प्याले का कभी स्वाद न लिया।

तेरे न आने से जिन्दगी बेरुखी हो जाती है

तेरे न आने से जिन्दगी बेरुखी हो जाती है

तेरे न आने से जिन्दगी बेरुखी हो जाती है
क्या हुआ मुझको क्यों न तू आकर देखे
पल दो पल उदासी में बीते न शिकायत करूँ
यहाँ जिन्दगी सारी गम हुई जाती है
मालूम था मुझको यह अंजाम होगा
मगर मज़ाक मेरा हक़ीक़त हुई जाती है
उल्फ़त माना कि कड़ुआ ज़हर है
इंतज़ार ज़िन्दगी को कम किए जाती है
तेरे न आने से जिन्दगी बेरुखी हो जाती है
क्या हुआ मुझको क्यों न तू आकर देखे।

उनसे इश्क करते हैं

उनसे इश्क करते हैं

उनसे इश्क करते हैं शूली पर चढ़ सकते हैं
यह तो इश्क है करते हैं मरने की हिम्मत रखते हैं
वादे एकबार होते हैं एक बार सिर्फ़
अगर करते हैं जिन्दगी भर निबाहते हैं
हमको कोई आबरू प्यारी नहीं प्यारा है एक इश्क
हर बदनामी को सह लें अगर वह वादा करें
जिन्दगी को पीकर बनाई है हमने एक शराब
उसमें उनकी और मेरी जिन्दगी के गीत लिखे हैं।

सुनाता हूँ कहानी मैं एक छात्र की

सुनाता हूँ कहानी मैं एक छात्र की


सुनाता हूँ कहानी मैं एक गरीब छात्र की
मेधावी था और था दुनियादारी से नादान
सरल था और था इश्क के नाम से अनजान
देखा एक दिन उसने भू पर एक नीला चाँद
गुमशुदा हुए होश और लुटा दिया अपना दिल
उसके लोचन से निकली इश्क की किरन मधुर
खुशबू थी एसी कि जो हर श्वांस में भर गई
हर लफ्ज़ में उसके उसका नाम रख गई
हर पुलक में उसकी पुलक हर सिहरन में इश्क
उसकी मुस्कराहट से छा गई लज़ीली स्मिति
एक दिन उसने उससे पूँछने का किया दुःसाहस
नहीं करती, हिम्मत कैसे हुई युवक तुम्हारी
दो शब्द की यह बात जिन्दगी को तूफान गई
लुटी जिन्दगी पल भर में लुट गए अरमान सब
हिम सा शीतल दिल उसका धधकता सूरज बना
और वह सदा सदा को प्रेम की कब्र में सो गया।

उदास क्षण

उदास क्षण
शिशुमयी भोले थे उसके बोल
उदास नेत्रों में भरी एक सरिता
ललाट पर भविष्य की चिंतित लहरें
उर से झलकती कहीं एक कविता
उदास वह थी उदास थी रात
उदास थी कितनी उदास थी
व्यक्त करती उसकी हर बात
न हंसती थी न रोती थी ।

यही है एक सत्य

यही सत्य है एक

झुरमुट से निकली है रुपहली चाँदनी
चाँद आज नया होकर आया है
छन रही त्रणों से एक मादक गंध
ज़मीं ने आज प्यार का गीत गाया है
यौवन खिल रहा उगते सूरज की तरह
देह पर आज मदिर नशा छाया है
आकाश ने बनाए हैं शत शत दीप
प्रभंजन आज खुशी का गुबार लाया है
खुश रहो और खुशी में लुटा दो प्राण
ज़हाँ में अपने गीतों का भर दो संगीत
कोई नहीं है फिर भी है कोई
सारा जगत आज बना है मेरा मीत
मायूसी छोड़ो रोना छोड़ो
अपनी मुस्कराहटों से बनाओ स्वर्ग
खुश को खुशी और दुखी को दुख
समझा मैं रहस्य यही है एक सत्य।

हवा चल रही प्यार की

हवा चल रही प्यार की

बयार चल रही है प्यार की
गीत न गुन गुनाऊँ तो क्या करूँ
यह पल कह रहा है प्यार कर
स्वप्नों में न सो जाऊँ तो क्या करूँ
दरख्तों ने खोल दी हैं बाहें
फूलों ने ले लिया मेरा चुम्बन
मसल रही है हाथों को कोई
अनजानी सौन्दर्य लता
विहागावलि के कलरव में
खो गया मेरा संगीत तन
कोई स्फुरण आया एकाएक
न जाने क्या उल्लास भर गया
आसमान की नीली साड़ी में
उलझ गया मेरा मन
आँचल गिरा तभी चाँद का
मैं परियों की गोद में सो गया।

डायरी (1)

13.12.1976

मुझको पहले ही उसको कहना चाहिये था कि उसकी मनःस्थिति ठीक नहीं है और उसको मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिये।---
मेरे कहने पर रा र भी शव दाह पर आया था।
वह कहने लगा मुझको भी तुम लोग जला आना। रा र की मनःस्थिति से मैं अनभिज्ञ न था।
मुझको बहुत क्रोध आया ।मैने कहा-तुम्हारे शव पर कुत्ते भी नहीं मूतेंगे।यदि मेरा वश चले तो एसे शव को चील व गिद्धों के लिये खुला छोड़ दूँ।
तुम एस के को जानते भी न थे फिर भी गये। मुझको तो अच्छी तरह जानते हो।
मैने कहा –एसी मृत्यु के बाद आदमी के शव की बड़ी दुर्दशा होती है।मेरा संकेत शव परीक्षण की तरफ था।
वह चुप रहा।
मुझको लगा वह कुछ कर न बैठे ।
मैं उसको क्यों जिन्दा रहना छहिये? जिन्दा रहने का क्या महत्व है, समझाता हूँ।
14.12.1976
माँ, कुछ दिन बनारस घूम आयें अच्छा रहेगा।
-मेरे पास पैसे नहीं हैं।
एस के-मैने मार्क्स गलत पढ़ा है। -बी टेक का प्रवेश गलत था।साहित्य साधना व्यर्थ है। मेरा समूचा जीवन-----------।
माँ से बीस पैसे लेकर सिगरेट खरीदने के लिये निकल पड़ता है अज्ञात राह पर---------।
शव कुयें में पाया जाता है। ---अंतिम अवशेष ।
आर एस ---इंटर ,बी एस सी ,एम एस सी प्रथम। कुछ वर्ष नौकरी।आठ वर्ष शोध ।उम्र तीस के ऊपर।–अधिकाँश नौकरियों के लिये द्वार बन्द । वजीफा बन्द। पैसे पैसे के लिये मोहताज ।एक एक कर मित्रों का छोड़ जाना।
कपड़े पहिनने को नहीं। न बिस्तर । न और कुछ ।
न माता। न पिता। न भाई । न बन्धु।
एक अनाथ बालक।
न कौटुम्बियों की कोई सहानुभूति। दो सत्रों से दूसरों की आर्थिक सहायता पर निर्भर।
दो वर्ष पूर्व मानसिक संतुलन बिगड़ गया था।
समस्या समाधान --- एसी स्थिति में सहानुभूतिपूर्ण रिसर्च गाइड को अभिभावक बनकर काम पूरा करवाना चाहिए।
एम एस- 10 तारीख तक पैसा जमा करना है।पास में पैसे नहीं है।जैसे जैसे दिन समीप आते हैं मानसिक तनाव बढ़्ता है।“ दो दिन से भूखा हूँ आत्म हत्या के अलावा क्या चारा है।“
यदि मनुष्य को मरुस्थल की गर्म रेत पर छोड़ दिया जाये--------।
समस्या समाधान ---व्यवस्थापकों व छात्रों का सहानुभूतिपूर्ण समंवित प्रयास ।एक टृष्ट की स्थापना एसे छात्रों की सहायता के लिए।
मिश्रा—आठ वर्ष से रिसर्च ।आसानी से छात्रवृत्ति ।गाइड की पूर्ण हमदर्दी।कोई मानसिक समस्या नहीं।
पोस्ट डॉक्टरल फेलोज
वी एस एस –उम्र 35 वर्ष ,नौकरी नहीं।
ए ए न –उम्र 33 वर्ष ,नौकरी नहीं।
आर ए और डा पी आर ---उम्र 36 वर्ष ।नौकरी कभी भी खत्म की जा सकती है।निरंतर चिंतित ।
एस के टी ---आशिंक कालिक नौकरी।अनेक पारिवारिक समस्यायें।
सी एच ---अति प्रतिभावान छात्र ।प्रदर्शन आशा के बहुत विपरीत।कुंठाग्रस्त।जीवन को तोड़ कर रख दिया है।
18.12.1976
एस के पी----उसके मानसिक संतुलन को किस दुर्घटना ने बिगाढ़ दिया ।
1971 में फैले चारों ओर के संत्रास ने? मार्क्स वादी छात्र गुट टूट चुका था। वे आदर्श व विचारधारायें टूट रही थी जिनके लिये उसने अपना कैरियर बरबाद किया था। 1971 में संचित आदर्शों पर प्रश्न चिन्ह लग चुका था। कितना बड़ा सदमा था सैंकड़ों वादों के साथ् जो गुट बना ,छण भर में खत्म होगया और गुट के सभी सदस्यों ने हार मान ली और अपने अपने स्वार्थों में लीन होगये। पहली बार उसने अनुभव किया था मनुष्य कितना ढोंगी होता है। उसके मानस में उभनते हुये ज्वालामुखी भर गये थे। वह चाहता था मनुष्य की इस नग्नता का कला के माध्यम से उजागर करे।परंतु वह समाज का मिसफिट प्राणी था।
वह काका हाथरसी व नीरज को सुनना शर्मनाक मानता था।
19.12.1976
वाई—कुछ दिनों से लगता है उसमें परिवर्तन आया है।वह आज मेरे सामने बैठा रहा घमण्ड की भावना न थी।6 पोइंट मिलने के बाद उसका घमण्ड चूर चूर होगया था।परिवर्त्तन जीवन का स्वभाव होता है।मेरे अधिक संवेदन शील होने की वजह से मेरे सम्मुख स्वयं को बढ़ कर देखना चोट अवश्य पहुँचाता था परंतु मैं जानता था यह बहुत अधिक दिनो तक टिकने वाला नहीं है।
यौवन भी क्या होता है! ठोडी सी प्रशंसा व अच्छा प्रदर्शन उसमें अभिमान की भावना भर देता है और अपने सामने किसी को गिनता नहीं है।
जहाँ तक मैं स्वयं को समझता हूँ मेरे अन्दर एसी कोई भावना न थी कि उसका प्रदर्शन खराब हो।------
उसका व्यवहार स्वाभाविक था।---मैं उसमें मनुष्य में शिशु का रूप देखता हूँ।
मैं वाई को कहना चाहता था –तुम्हारे अन्दर प्रौणता की कमी है।
कुछ व्यक्ति जीवन को समग्र रूप मैं देखते हैं और अपने अन्दर अहंकार को आने ही नहीं देते। एसे व्यक्ति दुनिया में कम हैं।
अधिकाँश व्यक्ति धीरे धीरे अपने अनुभवों के आधार पर चोट खाकर अहंकार को अलग करने की कोशिश करते हैं।
ऐसे व्यक्ति भी हैं जिनमें अहंकार व सहिस्णुता बारी बारी से अनुभवों के आधार पर आती जाती है और अनुभव के साथ तीव्रता भी बढ़ती जाती है।
यहाँ अहंकार शब्द को तीवृ अहंकार के रूप में प्रयोग किया गया है।अहंकार मनुष्य के स्वभाव से इतना घुला मिला है कि उसके स्वभाव से पूर्णतया अलग करने की बात करना ही निरर्थक है।अहंकार पूर्णतया स्वभाव से नष्ट हो ही नहीं सकता है।
---
मुझको यह देखकर आश्च्रर्य हुआ वह डी में स्त्रीत्व देख रहा था वह स्वयं स्त्री गुणों से लयमय है।वह डी का जिस प्रकार अनुकरण कर रहा था और एक नारी गायिका का रिकार्ड प्लेयर पर गायन सुनकर जैसे हाव भाव कर रहा था उसमें उसका स्त्रीत्व झलकता था।
हर मनुष्य में स्त्रीत्व होता है कम या अधिक।कुछ अधिक पुरुष होते हैं और कुछ कम।

21.12.76

टिटहरी की आवाज सुनकर मैंने उसकी आवाज की नकल करते हुये सीटी बजाई। वह समीप ही थी। वह मुझको घूरने लगी ।मैं आगे बढ़ा।वह धीमे स्वर में बोलती रही।
कहते हैं बेरी सर्वाधिकारी ने आत्महत्या पैसे की कमी के कारण की।रुग्ण शरीर ,65 की उम्र और पैसे की कमी। होटल में आत्महत्या।क्या पास में पैसे होते ऐसा नहीं करते?
22.12.76
कहानी “शूल” लिखने के बाद मैं अनुभव कर रहा था मेरी सहानुभूति पात्र के पिता के साथ थी।शूल एक संकेत है अवश्यम्भावी संकेत जो परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु पर किसी न किसी को सालती रहती है या पीड़ा पहुँचाती रहती है।पूर्णतया साफ मृत्यु कम ही देखने को मिलती है।----कहीं न कहीं लापरवाही हो ही जाती है---मैं सोचता हूँ एस के की माँ के मन में अवश्य ही यह पश्चाताप होगा काश! वह एस के के साथ बनारस चली जाती।यह भी सत्य है कभी कभी एक तिनके भर का सहारा या एक सहानुभूति या स्नेह का शब्द आत्महत्या को रोक देता हैं। पश्चाताप की तीव्र अनुभूति उनको ही होती है जिनका मन साफ होता है और जिनका हृदय स्नेह से सराबोर होता है।

क्या तुम जानते नहीं हो?

क्या
तुम जानते नहीं हो?




कैसा हंगामा
कैसा हाहाकार
पीला लबलबा चिपचिपा
चादर से चिपका
कमरे में
बिस्तर पर बिछे चादर के ऊपर
मैने तो किया नहीं
अरमान
व महत्वाकाँझायें
टूटी टूटी
गिरी गिरी
फर्श पर बिखरी हुईं
मेरी तो हैं नहीं
कुचली कुचली गूलर
पैरों तले
बीज छितरे छितरे
मिट्टी में मिली
मैने तो रोंदा नहीं
यह क्या
मोतियों से भरा थाल
दावानल में ढुलक गया
मैने तो देखा नहीं
सूखी टहनियाँ
आग में चटकती हैं
क्या
तुम जानते नहीं हो?

नारीत्व

नारीत्व

दरख्त के नीचे सोई बालिका
उठ उठ बैठती है
सम्हल सम्हल कर देखती है
आँचल को
और देखती है
पीपल के पेड़ से घिरा दरगाह
नाले के ऊपर बना लाल तिकोना युवक दुलार
और
सिर के ऊपर आसमान की रुबाइयों में आम्र बौर
दुपहरी ह्ठीली
सो न पायी अलबेली
अंगड़ाइयों में हाँ
अंगड़ाइयों में स्वप्न
“वह तो नारी है”
शर्मीली स्मिति ने आँचल धर दबोचा
गर्वोन्नत हो उठी
अपने नारीत्व की सान्द्र स्पष्टता पर।

आज उदास उदास कहने को

आज उदास उदास कहने को
मन चाहता है।


आज उदास- उदास कहने को
फूलों से अठखेलियाँ करने को
पाक मुस्कराह्टों से दो पल जीने को
मन चाहता है
परंतु मैं कहाँ खड़ा हूँ
अन्धेरे में उद्यान में विचरण करने पर बलात्कार की दुर्गन्ध आती है
निर्दोष शावकों के सिरों पर प्रहार होते देख
मन बुझ- बुझ जाता है
अपनी असमर्थता पर
अपनी कृतघ्नता पर
सोचता हूँ
मेरा लिखना निरुद्देश्य है
मेरे गीत प्रभंजन में सुवास नहीं भर सकते
प्रौढ़ शरीरों पर वेदना की मार के गहरे गड्ढे पड़ गये हैं
काँप रहे हैं
मधुमास पराग नहीं बिखरते
कोपलें टूट -टूट कर गिर रही हैं
बसंत में जब प्रसूनों की बहार आती थी
आज एक अधखिला प्रसून भी दिखायी नहीं देता
कभी कभी तो लगता है
मनुष्य मक्खियों के समान शौच पर गिर पड़े हैं
और सौन्दर्यवेत्ताओं को भी वहाँ देख्कर
मन विषादमय हो उठा है
कहते हैं
श्मशान पर वैराग्य होता है
परंतु रक्तिभ चिताओं के बीच लोग हँस रहे हैं
किस शहर में आ गिरा हूँ
साथ के लिये एक जंगली पुष्प भी नहीं है
आज उदास- उदास कहने को
मन चाहता है।

कैसे लिखूँ ?

कैसे लिखूँ ?

मै सोचता हूँ
मैं अपने अनुभवों को रक्त से भिगोकर लिखूँ
मैं अपने शरीर व अपनी आत्मा से लिखूँ
अपने हृदय की धड़कन व रोमों के कम्पन से लिखूँ
मै सोचता हूँ
मैं चेहरे को कैनवास पर अपने रक्त से रंग लूँ
अपनी अंगुलियों से अपनी आँखें निकालकर कैनवास पर जमा दूँ
मैं वेदना के अन्दर घुस कर लिखूँ
दुख को अन्दर घुस कर जानूँ
सतही प्रेम मुझे नहीं भाता
प्रेम के अन्दर घुस कर प्रेम को अंवेषित करूँ
मै सोचता हूँ
मैं नग्न सत्य को उभार- उभार कर हर पर्त को लिख लूँ।

प्रकृति से एकाकार

प्रकृति से एकाकार

यहाँ मेरा कोई नहीं है
मैं भले ही अकेला हूँ
परंतु हवा इठला - इठला कर मुझसे अठखेलियाँ करती हैं
मैं अनुभव कर सकता हूँ
मुझसे किसी ने बातें की हैं
वह मुझको अपना समझती है
बार बार वह मेरे कानों में कहती है
कितना मधुर है यह स्वर संगीत ।
मैं जीवन के संघर्षों से बेफिक्र हूँ
चिंता निरपेक्ष हूँ
यहाँ पल्लवों में जीवनदृष्टि उलझ गई है
मेरा मानस प्रकृति से एकाकार हो उठा है
यही मेरा कुटुम्ब है
यही मेरा घर है
यहीं मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हैं मेरे भाव
मेरा सौन्दर्य मन
मेरे प्राण
यहाँ दरख्तों की घनी स्मित में
खिलती है मेरी स्मित
यहीं मैं जीवित हूँ
यहाँ मेरा कोई नहीं है कौटुम्बी भले ही
फिर भी कुछ पल के लिये
यहाँ मैंने सब कुछ पा लिया है।

ए बुलबुल

ए बुलबुल

ए बुलबुल
आम्र मंजरियों के झीने पीले उठे उरोजों
पर तुझे फुदकता देखकर
मैं अपनी अभिव्यक्ति की सतहों के नीचे दब गया हूँ
चमकीले काले परों में छिपा तेरा रक्ताभि लाल
पार्श्व न जाने कैसा अरुण फल सौन्दर्यमयी पा लेने की चेष्टा से
टूक टूक अचेतन रहस्य बन गया है
और
तेरी ध्वनि अनुबन्ध ने श्राव्य स्वर मय संगीत बन मधुरिमा से रतिक्रीड़ा कर,
सुनहले तानों का मायावी जाल रच
मुझे सम्मोहित कर अपने वश में कर लिया है
ए बुल बुल।

संभावनाएं

संभावनाएं
जाने क्या है
जो निकलना चाहती है
जलवृक्ष या सिमार
अंतःकरण के बाहर
वह सर्प है या मगर
जो हृदय पर लोटता है
कुछ निगलने को
क्या कुछ पाने को
केक्टस या गुलखेरा के फूल
नीलाकाश को सिमटता है
मकड़ियाँ अपने ही बनाये जाले पर दौड़्ती हैं
मेरे अन्दर का नन्हा शिशु उदास है
क्या कहेगा
माँ के पेट के अन्दर है
यह कल्पना कितनी विचित्र लगती है
विहगों के सफेद अण्डों को देखकर कि
ये फुदक फुदक कर उड़ती हैं
और दौड़्ती हैं
समुद्र के पार।



















कविता करने की अवस्था

कविता करने की अवस्था

सीने पर बन्दूक ताने आदमी खड़ा है
सोचता हूँ
गोली शायद प्रेम की निकले
भागता नहीं हूँ
इधर उधर
पहले मुझे सोन नदी का
पूर्ण सौन्दर्य नेत्रों में भर लेने दो
आकाशगंगा उतरी है
जमीन पर
आदमी की खुली पगड़ी पर
तैर रही है
सहमा हुआ हूँ
कविता लिखी नहीं गई।

पल भर का परिचय

पल भर का परिचय

पल भर का परिचय
वह चेहरा
चेहरा नहीं
शिशिर की मणिभ धूप है दरख्तों पर
पिघलती नदी की आभा
हिमाच्छन्न भू पर
वह
वह एक गल्प
वह फैलती है अंतरिक्ष पर
सप्तरंगों में
रजत नीलममणि की छाया में
वह
वह अवस्थित है
जीवन के सौन्दर्य के नृत्य के संगीत में।

तुम कलाकृति हो

तुम कलाकृति हो

तुम कलाकृति हो
मैने कहा
कैसे ? उसने पूछा
उसके हाथों में मेंहदी थी
पैरों में बिछुये थे
कानों में कर्णफूल

नेत्रों में
अनेक रहस्यमयी प्रश्न
मैने देखा
वह गम्भीर थी
परंतु उसने मेरी समस्त जिज्ञासा को
अपने नेत्रों में भरा
और कई प्रश्न
उसके चेहरे पर सौन्दर्य में
पिघल कर
ओठों पर हलकी स्मिति में उतर आये
कैसे ?
उसने फिर पूछा
तुम कलाकृति हो
मैने कहा।


Monday, November 19, 2007

Photo self


सर्वस्व जलमग्न

सर्वस्व जलमग्न

जल, जल, जल सर्वस्व
नहीं देख पाता जमीन को कहीं भी
आगे बढ़ती हुई विशाल जल लहरें
मेरी विषाद भरी आत्मा को निगल रहीं हैं
मैं कैसे इस जलमग्न पथ पर आगे बढ़ूँ ?
मैं वही जलप्लावित सपने बार बार देखता हूँ
मैं वही बन्द गोलाकार पथ पर निरंतर चलता हूँ
और वही घने व अति डरावने अरण्य में दौड़ता हूँ
मैं कैसे इस भूलभुलैये से बाहर निकलूँ
जल, जल, जल सर्वस्व
नहीं देख पाता जमीन को कहीं भी।

संघर्ष अनवरत है।

संघर्ष अनवरत है।

मै नदी के अन्दर बढ़ाये हुये चबूतरे के
आखिरी छोर पर खड़ा होता हूँ
मै दीवार की दरारों का अवलोकन करता हूँ
पीछे की ओर मुड़ता हूँ
और शक्तिपात देखता हूँ
मैं भँवरों के आगे खड़ा हूँ
ढाल पर चढ़ता हूँ
और जल लहरें मेरा पीछा करती हैं
मैं अपनी दृष्टि भीमकाय जल के फैलाव
और साथ की दीवार की गूढ़ आकृतियों पर डालता हूँ
सूक्ष्म आकृतियाँ व अति सूक्ष्म प्रौद्योगिकी
व सूक्ष्म तम कीड़ों मकोड़ों पर
मैं स्वयं को उनके साथ जोड़ कर देखने की कोशिश करता हूँ
अपनी और उनकी प्रकृति की समानता में
मैं संहार व निर्माण के ऊपर उठकर
जीवित रहना चाहता हूँ
संघर्ष अनवरत है।