संघर्ष अनवरत है।
मै नदी के अन्दर बढ़ाये हुये चबूतरे के
आखिरी छोर पर खड़ा होता हूँ
मै दीवार की दरारों का अवलोकन करता हूँ
पीछे की ओर मुड़ता हूँ
और शक्तिपात देखता हूँ
मैं भँवरों के आगे खड़ा हूँ
ढाल पर चढ़ता हूँ
और जल लहरें मेरा पीछा करती हैं
मैं अपनी दृष्टि भीमकाय जल के फैलाव
और साथ की दीवार की गूढ़ आकृतियों पर डालता हूँ
सूक्ष्म आकृतियाँ व अति सूक्ष्म प्रौद्योगिकी
व सूक्ष्म तम कीड़ों मकोड़ों पर
मैं स्वयं को उनके साथ जोड़ कर देखने की कोशिश करता हूँ
अपनी और उनकी प्रकृति की समानता में
मैं संहार व निर्माण के ऊपर उठकर
जीवित रहना चाहता हूँ
संघर्ष अनवरत है।
Monday, November 19, 2007
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