Friday, November 23, 2007

ए बुलबुल

ए बुलबुल

ए बुलबुल
आम्र मंजरियों के झीने पीले उठे उरोजों
पर तुझे फुदकता देखकर
मैं अपनी अभिव्यक्ति की सतहों के नीचे दब गया हूँ
चमकीले काले परों में छिपा तेरा रक्ताभि लाल
पार्श्व न जाने कैसा अरुण फल सौन्दर्यमयी पा लेने की चेष्टा से
टूक टूक अचेतन रहस्य बन गया है
और
तेरी ध्वनि अनुबन्ध ने श्राव्य स्वर मय संगीत बन मधुरिमा से रतिक्रीड़ा कर,
सुनहले तानों का मायावी जाल रच
मुझे सम्मोहित कर अपने वश में कर लिया है
ए बुल बुल।

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