मेरे कमरे की छत पर शरद में ठंड से ठुठरती मक्खियाँ हर रात्रि को बसेरा डाल लेती थीं। सुबह होता था ,पक्षियाँ चहचहाने लगती थीं।दो पक्षी कमरे के रोशनदान से आकर मक्खियों पर युद्ध छेड़ देते थे।बेचारी मक्खियाँ नम परों से उड़ भी न सकती थीं और आत्मसमर्पित सी उन पक्षियों की चोंच में चली जाती थीं।मुझको उन मक्खियों पर बहुत दया आती थी।
अब बसंत है धूप तेज निकलती है वे पक्षी अब भी उसी समय आते हैं और छत की दीवार पर बार बार चोंच मारते हैं परंतु मक्खियाँ अब फुर्र से उड़ जाती हैं। पक्षी अपने सिर को इधर उधर चारों ओर घुमाकर देखते हैं और चोंच मारने की पुनरावृत्ति होती है परंतु शिकार को नहीं पा पाते।
अब मुझको उनकी कुँठा पर तरस आता है।
Saturday, November 24, 2007
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