पुस्तकालय के समीप
तेज हवा चलती है
तेज तूफान की तरह
फुहारों की तरह सिर पर मारती है मार।
बेलों पर लगी फुनगियाँ उड़ रही हैं अलकों के ऊपर।
उदास धूप, फैलती हुई मुस्कराहटॉं से हँस रही है।
कारीडोर के ऊपर
खम्भों की मार से व्यथित
गुलाबी फूलों से लदी लतिकाओं में
उदासीनता है अपने अस्तित्व पर।
लम्बी कारीडोर एक नारी की तरह है
जिसकी नाक में स्वर्ण नथ है
कान मैं रजत बालियाँ
होठों पर बैगनी लिपिस्टिक
रंग बिरंगे बेलबूटों की हरी साड़ी में है नृत्यलीन।
पुस्तकालय का ललाट बुद्धिजीवियों की तरह बड़ा व चौड़ा है।
छछूँदर जैसे तेजी से चढ़ जाती है दरख्त पर
एसे ही उठ रहे हैं मेरे विचार
और जैसे एक नटखट बालिका
कारीडोर पर चलते हुए तोड़ लेती है पुष्प
एसे ही कट जाती है मेरी अनुभूति।
हवा की गति मेरी कविता है
और कमर हिलाते पौधे मेरी कविता के शब्द।
कोशिश कर रहा हूँ
समूचे दृश्य को आकार देने की
परंतु मेरी कोशिश है निरर्थक।
Saturday, November 24, 2007
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