सर्वस्व जलमग्न
जल, जल, जल सर्वस्व
नहीं देख पाता जमीन को कहीं भी
आगे बढ़ती हुई विशाल जल लहरें
मेरी विषाद भरी आत्मा को निगल रहीं हैं
मैं कैसे इस जलमग्न पथ पर आगे बढ़ूँ ?
मैं वही जलप्लावित सपने बार बार देखता हूँ
मैं वही बन्द गोलाकार पथ पर निरंतर चलता हूँ
और वही घने व अति डरावने अरण्य में दौड़ता हूँ
मैं कैसे इस भूलभुलैये से बाहर निकलूँ
जल, जल, जल सर्वस्व
नहीं देख पाता जमीन को कहीं भी।
जल, जल, जल सर्वस्व
नहीं देख पाता जमीन को कहीं भी
आगे बढ़ती हुई विशाल जल लहरें
मेरी विषाद भरी आत्मा को निगल रहीं हैं
मैं कैसे इस जलमग्न पथ पर आगे बढ़ूँ ?
मैं वही जलप्लावित सपने बार बार देखता हूँ
मैं वही बन्द गोलाकार पथ पर निरंतर चलता हूँ
और वही घने व अति डरावने अरण्य में दौड़ता हूँ
मैं कैसे इस भूलभुलैये से बाहर निकलूँ
जल, जल, जल सर्वस्व
नहीं देख पाता जमीन को कहीं भी।

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