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Friday, November 23, 2007
छात्र
छात्र
क्यों दुखी हैं ये छात्र
उम्र कम है व अवसाद से घिरे हैं
झुधातुर हैं व शत जन्म प्यासे
किसी को कहीं त्रप्ति नहीं है।
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एक दोपहर
पुस्तकालय के समीप
लाल कंगन
दौड़ने लगा संतरे के बागों की ओर।
उसकी मंगनी टूट गई थी।
सौन्दर्य
नीलकण्ठ
दया
मनुष्य तू गतिमय है
प्रश्न करती प्रतीत होती है
सुबह से गीतों की बदली छायीहै
प्रिय टूटी तमन्नाओं का चाँद बन कर चली आ
टूट गया मन का आसरा
अपनी बाहों का सहारा दे दो
मैं नदी के मंझधार
अगर तुम साथ होती
नदी का किनारा
मेरे जीवन की सूनी कुटिया में तुम न आना
न जाने कैसी यह मस्ती छायी
पथ के बच्चों के नाम
आज वेदना रोती
न जाने कैसी यह मस्ती छायी
क्या भावना क्रीड़ा की मधुर शैली ?
तुमने जोड़ दी है
क्या कोई भुला सकता है वह प्रेम ?
दिल में है मेरे तरंग
टूट गया कहीं मेरा मिलन
छात्र
तेरी आँखों में
निमंत्रणों में
तेरे न आने से जिन्दगी बेरुखी हो जाती है
उनसे इश्क करते हैं
सुनाता हूँ कहानी मैं एक छात्र की
उदास क्षण
यही है एक सत्य
हवा चल रही प्यार की
डायरी (1)
क्या तुम जानते नहीं हो?
नारीत्व
आज उदास उदास कहने को
कैसे लिखूँ ?
प्रकृति से एकाकार
ए बुलबुल
संभावनाएं
कविता करने की अवस्था
पल भर का परिचय
तुम कलाकृति हो
Photo self
सर्वस्व जलमग्न
संघर्ष अनवरत है।
About Me
DHARAM PRAKASH JAIN
I have started writing both in Hindi and English and compiling and editing old writings of 1970-1978 since January 2007.
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