Saturday, November 24, 2007
प्रश्न करती प्रतीत होती है
वह धूल और मैल से लिप्त बालों की गाँठ के साथ ,अपने नंगे हाथों से बालों को खुजाते हुए जिसकी बगलों पर खाज के चितकबरे बने है और सड़ी दुर्गन्ध आ रही है , हाथ में मैले कपड़ों का गट्ठर उठाये हुए ,एक छोटा सा दुकूल कमर पर रस्सी के समान कपड़े से बंधा है, सामने के आधे हिस्से पर है जो उसके चलने पर जांघों की गति के साथ छणिक समय के लिये गुप्तांगों को आवरणहीन कर देता है ,नितम्ब पूर्ण रूप से खुला है, एक राजसी चाल से मशहूर कानपुर शहर के प्लेटफार्म नम्बर एक पर ,भले व सभ्य घराने के यात्रिओं के बीच से लज्जित करती हुई क्रूर हास्य भाव से निर्भय घूम रही है। संसार के प्रति नेत्रों में घृणा भाव है।वह देश के सभ्य समाज से प्रश्न करती प्रतीत होती है संसार के द्वारा फैंकी हुई ,समाज में अत्यंत पतित व घृणित कही जाने वाली ,भले ही उसने चोरी ,क्रूर हिंसा या वैश्यावृत्ति की हो ,उस दार्शनिक के सामान्य मानव की तरह जीने के लिए क्या उपादान है ? या क्या साधन प्रदान करता है?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment