Saturday, November 24, 2007

सौन्दर्य

मैं और मेरा एक मित्र नहर के किनारे घूमने निकलते हैं।आगे एक पुलिया आती है और उससे सटे एक वृक्ष पर बया के चार घोंसले लटके होते है। मैं कहता हूँ कितने सुन्दर है आश्च्रर्य होता है इनकी कार्य कुशलता पर और कला परख दृष्टि पर।वह कहता है ये निश्चय ही अति सुन्दर हैं और मैं उनको अपने कमरे में लगाऊँगा। मैं उसको रोकता हूँ तुम ऐसा नहीं कर सकते। परंतु वह तेजी से वृक्ष के समीप पहुँच जाता है ,सभी पक्षी घोंसले से बाहर निकल कर क्रन्दन करते हैं।वह एक एक कर सभी घोंसले तोड़ लेता है। पक्षी चिल्लाना बन्द कर देते हैं और एक टक उसकी ओर निर्मूक दृष्टिदेखते रहते हैं। मैंने उसको कहा तुम्हारा यह कार्य निर्दयता पूर्ण है।वह चारों घोंसले हाथ में थामे लौटता है।परंतु वे पक्षी करुण नेत्र उसको देखते रहते हैं।
मैं अब जब भी उसके कमरे में जाता हूँ मुझको वे घोंसले सुन्दर नहीं लगते। मुझको लगता है सौन्दर्य का गूदा उनमें से निकल चुका है और वे केंचुल की भांति खाली खाली हैं।

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