पथ के बच्चों के नाम
बसन्त पर फूल खिलते हैं कहते हैं यौवन के
आभूषणों से सजते हैं पौधे वस्त्र उतार जीर्ण
पके खेतों में विचरती हैं उल्लसित हो नारियाँ
अठखेलियाँ करती हैं चंचल गेहूँ की बालियाँ
भू को सजाती हैं सरसों आह्लाद से फूलकर
सन्देश अभिसार के देते हैं फाख्ता आ आकर
आशा देती है मन को कोयल कुहू कुहू कर
बोलता हर पल मेरा मन परन्तु विपद स्वर
कहाँ है इन बच्चों की उम्र का वसन्तोत्सव?
कहाँ आशा नव? सन्देश नव ? जीवन नव?
कब आयेगा? इन बच्चों का उत्थान दिवस
क्या लिखूँगा ? कभी मैं इनके गीत उलस
Saturday, November 24, 2007
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