Saturday, November 24, 2007
उसकी मंगनी टूट गई थी।
मैंने कुछ दिनों से उसको अत्यंत उदास देखा। फूलों की तरह हंसी बिखेरती हुई वह घूमा करती थी।अचानक उसमें परिवर्तन आया और उसका गुलाब सा चेहरा मुरझाया हुआ रहने लगा।उसकी बोली में मधु था परंतु वह अब पीड़ा भरी बोली बोला करती।उसका स्वर संगीत की तरह उफनता न था वरन श्मशान की तरह शांत व हलका रहने लगा।उसके पैरों की गति में दौर्बल्य था । शरीर में अचानक शिथिलता आ गई थी।उसके चंचल नयन देखा न करते वरन लगता भीतर ही भीतर अपने अंतर्मन में झांक रहे हों।मेरे मन में उसके परिवर्तन को लेकर कुतूहल हुआ। उसकी मंगनी टूट गई थी।
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