क्या कोई भुला सकता है वह प्रेम ?
क्या कोई भुला सकता है वह प्रेम ?
जहाँ श्वास ,ओठ ,भावनायें ,शरीर व अपना सर्वस्व दिया हो
जहाँ गीत, मीत,स्वप्न, संगीत व अपना सर्वस्व खोया हो
जहाँ गति,हृदय ,चेतना,प्राण व उत्तेजना अवमानित की हो
जहाँ पुलक ,थिरकन, हँसी , स्मिति व लय कम की हो
जहाँ उँगलियाँ कम्पित,हृदय शंकित,व ओठ विकम्पित साहस किया हो
जहाँ लक्ष्य, फल,फूल, गुलाब व माधुर्य छोड़ दिया हो
वह अवरुद्ध हृदय से उमड़ता अगाध पारावार अब सीमाहीन हो अनंतता में फैल चुका हो क्या कोई भुला सकता है वह प्रेम ?
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