प्रकृति से एकाकार
यहाँ मेरा कोई नहीं है
मैं भले ही अकेला हूँ
परंतु हवा इठला - इठला कर मुझसे अठखेलियाँ करती हैं
मैं अनुभव कर सकता हूँ
मुझसे किसी ने बातें की हैं
वह मुझको अपना समझती है
बार बार वह मेरे कानों में कहती है
कितना मधुर है यह स्वर संगीत ।
मैं जीवन के संघर्षों से बेफिक्र हूँ
चिंता निरपेक्ष हूँ
यहाँ पल्लवों में जीवनदृष्टि उलझ गई है
मेरा मानस प्रकृति से एकाकार हो उठा है
यही मेरा कुटुम्ब है
यही मेरा घर है
यहीं मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हैं मेरे भाव
मेरा सौन्दर्य मन
मेरे प्राण
यहाँ दरख्तों की घनी स्मित में
खिलती है मेरी स्मित
यहीं मैं जीवित हूँ
यहाँ मेरा कोई नहीं है कौटुम्बी भले ही
फिर भी कुछ पल के लिये
यहाँ मैंने सब कुछ पा लिया है।
Friday, November 23, 2007
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