Saturday, November 24, 2007

मैं नदी के मंझधार

मैं नदी के मंझधार
मैं नदी के मंझधार में
खड़ा हो प्यार का गीत लिखता हूँ
देखता हूँ
हर तरफ तेरा रूप ही दिखलायी देता है
जब जल लहरों पर
दिनकर की रश्मिपुंज पड़ती हैं
लगता है तेरे चेहरे की सुहावनी मुस्कराहट फैल गई हो
नदी के दूसरे छोर
पर दरख्तों का समूह है
उनमे है तेरी गहन उजली संभली केशों की छटा
मेरे सामने चमकते हुए विशालकाय सूरज में है
तेरा ललाट
नभ पर सफेद विहगों की पाँत
बनी है तेरी तरुण माँग
वायु झोंको के साथ उठता हुआ
सफेद बालू का गुबार
करता है तेरी विशालकाय जाँघ अनावृत
जल के बीचोंबीच पृथ्वी
की गोलाकार आकृति बनी है
सुप्त नितम्बों की छवि
विशाल जल का फैलाव है नदी का
तेरा सुकोमल वक्षस्थल
हे सौन्दर्य देवी
मैने तुझको प्रकृति कीगोद में पा लिया है क्रीणामग्ननदी के मंझधार में
खड़ा हो मैं तेरा गीत लिखता हूँ।

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