आज उदास उदास कहने को
मन चाहता है।
आज उदास- उदास कहने को
फूलों से अठखेलियाँ करने को
पाक मुस्कराह्टों से दो पल जीने को
मन चाहता है
परंतु मैं कहाँ खड़ा हूँ
अन्धेरे में उद्यान में विचरण करने पर बलात्कार की दुर्गन्ध आती है
निर्दोष शावकों के सिरों पर प्रहार होते देख
मन बुझ- बुझ जाता है
अपनी असमर्थता पर
अपनी कृतघ्नता पर
सोचता हूँ
मेरा लिखना निरुद्देश्य है
मेरे गीत प्रभंजन में सुवास नहीं भर सकते
प्रौढ़ शरीरों पर वेदना की मार के गहरे गड्ढे पड़ गये हैं
काँप रहे हैं
मधुमास पराग नहीं बिखरते
कोपलें टूट -टूट कर गिर रही हैं
बसंत में जब प्रसूनों की बहार आती थी
आज एक अधखिला प्रसून भी दिखायी नहीं देता
कभी कभी तो लगता है
मनुष्य मक्खियों के समान शौच पर गिर पड़े हैं
और सौन्दर्यवेत्ताओं को भी वहाँ देख्कर
मन विषादमय हो उठा है
कहते हैं
श्मशान पर वैराग्य होता है
परंतु रक्तिभ चिताओं के बीच लोग हँस रहे हैं
किस शहर में आ गिरा हूँ
साथ के लिये एक जंगली पुष्प भी नहीं है
आज उदास- उदास कहने को
मन चाहता है।
Friday, November 23, 2007
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