Saturday, November 24, 2007

लाल कंगन

लाल कंगन


धूप पुल पर से उतर रही है
नदी के उस पार
विहगों का एक झुंड चह्चहा रहा है
सुबह से कई मुर्दे इस घाट से
नदी अंतराल बहाये जा चुके हैं
न जाने कितने लोगों ने गंगा स्नान किया है
मैं दरख्तों के बीच से
क्षितिज पर सूर्य को डूबते देखता हूँ
मुझको लगता है यह सब एक ही कहानी का अंत है
इस कहानी में मुझको यह और जोड़ना है
मैं कगार पर गिरे फूलों व दूर फूस पर स्थित
लाल कंगन को देख कर व्यग्र हूँ।

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