कैसे लिखूँ ?
मै सोचता हूँ
मैं अपने अनुभवों को रक्त से भिगोकर लिखूँ
मैं अपने शरीर व अपनी आत्मा से लिखूँ
अपने हृदय की धड़कन व रोमों के कम्पन से लिखूँ
मै सोचता हूँ
मैं चेहरे को कैनवास पर अपने रक्त से रंग लूँ
अपनी अंगुलियों से अपनी आँखें निकालकर कैनवास पर जमा दूँ
मैं वेदना के अन्दर घुस कर लिखूँ
दुख को अन्दर घुस कर जानूँ
सतही प्रेम मुझे नहीं भाता
प्रेम के अन्दर घुस कर प्रेम को अंवेषित करूँ
मै सोचता हूँ
मैं नग्न सत्य को उभार- उभार कर हर पर्त को लिख लूँ।
Friday, November 23, 2007
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