Saturday, November 24, 2007

एक दोपहर

एक दोपहर

बहता रहता है
बहता रहता है
खेतों व खलिहानों में एक शाश्वत विचार
सौन्दर्य के वातायन पर बैठा है एक श्वेत हंस
गतिशील हैं कल्पनाओं के दृश्य क्रमबद्ध
संगीत में उतर गया है समूचा भूतल
दोपहर है
मन्द हास में डूबा प्रकृति का तृण तृण
नील ज्योति बिखरा कर उड़ता है एक नीलकंठ
अरहर के पौधे सो जाते हैं पवन संग
मैं हूँ विचलित
क्योंकि निहार नहीं पाता
सम्पूर्ण सौन्दर्य
दिवाकर की भांति सृष्टि का।

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