Friday, November 23, 2007

निमंत्रणों में

निमंत्रणों में

निमंत्रणों में जीता मैं तेरी खुली बाहों के
तेरी मुस्कराहटों से मेरे पग बढ़ते हैं
निगाहों से कुछ एसी बातें होती
गीत लिखते तेरे होठों के ठिरकने से

तेर मुलायम अलकों के झटकने से
मस्तिष्क का संत्रास हट जाता है
तुमने नहीं बाँधा इस जूड़े को क्यों
मेरा स्वर खिज़ाओं में बहक जाता है

कितना आशियाना है तेरा मिज़ाज
चाहने वाले का प्याला भर देती हो
मदिरा मदिरा वह चिल्लाता है
मादकता से मग भर देती हो

तेरी खुली कलाई के व्युत्कृम घुमाव ने
तेरी गोरी बाहों ने सूनी निगाहों ने
मदहोश कर रखा है मन आशिक़ का
तन आशिक़ के बोल स्वर आशिक़ के
तेरे अंतर्मन की मधुर खुशबू ने
मायावी मन को भोला रूप दिया
धधकते हुए अंतर्द्वन्दित मानस को
शांत किया स्वसुबोध दिया

कितनी भंगिमाओं में मैं तुझको देखूँ
मदहोश नेत्र तुझे देख न पाये
समीप खड़ी सामने बैठी
ये नेत्र तुझे पहचान न पाये

मौन हुये हम बैठे रहे थे तब
अँधियारी रात्रि का होता था शोर
तुम तो मुस्काती थी मंद मंद
मुस्काती ओठों की कोर

रहस्यमयी बैठी रही तुम ,अव्यक्त
प्यार का कभी इज़हार न किया
प्याले पर प्याले भरे मदुरा के
प्याले का कभी स्वाद न लिया।

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