Saturday, November 24, 2007
मनुष्य तू गतिमय है
मनुष्य ! तू गतिमय है।गति ही जीवन का लक्ष्य है। गति का तेज होना या मंथर होना गति की विशेषता है।अपनी मंथर गति पर शोक मत कर।जल में लहर उतार चढ़ाव के साथ चलती हैं।यह उतार चढ़ाव भी लहरों की विशेषता है।यह भी सम्भव है लहरों का पथ कोई दुष्ट भँवर अवरुद्ध कर ले या कोई वाचाल किनारा लहरों की गति को कुछ समय के लिए रोक ले परंतु फिर भी लहरें आगे बढ़ने का प्रयत्न करती हैं या आगे बढ़ने के लिये अन्य पथ ढ़ूढ़ती हैं इस प्रयत्न में लहरों को वापिस लौटना पड़ सकता है। लहरों के वापस लौटने या डूब कर विलीन होने में कोई अपमान नहीं है।आगे न बढ़ने पर शोक न कर।यह न देख कितना आगे बढ़ता है। देखना है कि गति के लिए प्रयत्न तो बन्द नहीं कर दिया। गतिशीलता ही सर्वोच्च विकास है।गतिशील रहना ही सर्वोत्तम लक्ष्य है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment