Tuesday, December 4, 2007

पश्चाताप

पश्चाताप
चुभते हैं शूल की तरह
जब भी याद करते हैं
अपनी कही हुई गलत बातें
या अपने कुकृत्य
जानबूझ कर किये हुए
या अनजाने में
या परिस्थितिवश
या असहायावस्था में,
बोझ हैं हृदय पर
मैं उनको हटा नहीं पाता।
वे खुश नसीब हैं
जो रख देते हैं
उनको ईश्वर के सिर के ऊपर
और बुलबुले की तरह
उड़ा देते हैं हवा में,
या जो नियतिवादी हैं
भूल जाते हैं उनको
शकुंतला के दुष्यंत की तरह।
मैं सोचता हूँ
वे खुश नसीब भले ही हों
परंतु नहीं रोक सकते
स्वयं को उन
ट्रुटियों की पुनरावृत्ति से,
वे जीते हैं
सियार के समान
दोषों से छिटके संसार में।
परन्तु विषाद भरा मैं
चाहता हूँ
उन दोषों को न दोहराऊँ
और जीऊँ
उनके भय से चौकस
जंगल में खड़े बारहसिंघे की तरह्।

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