Wednesday, January 30, 2008

क्यों खड़े हो ?

क्यों खड़े हो ?


क्यों खड़े हो
मायूस व
अवरुद्ध गति ?
नहीं जानते
बारी- बारी से आते हैं
समय के पुँछल तारे
जिन्दगी पर छोड़ते हैं
दुखद छाप
जगह एसी नहीं है
उड़ सकें फाख्तायें
यहाँ स्वतंत्र
धूल के गुबार से
ढक गया है
समस्त गगन
बाग में नहीं हैं गुलाब
इसीलिये
डालियाँ
झुक कर कहती हैं
सर्प आ फुफकार।