Tuesday, October 13, 2009

नीलकंठ का नीड़

नीलकंठ का नीड़


एक नीलकंठ
दूर से आकर विश्राम के लिये
गाजीपुर के मुर्गी पालन फार्म के
पास टीले पर बैठा-
चील,गिद्ध व कौवों के
झुण्ड के झुण्ड
चारों ओर आसमान पर मंडरा रहे थे ।
नीलकंठ ने गर्दन घुमायी
और चारों ओर देखा
उसके आस पास कोई नहीं था।
तभी एक कौवा आया
उसके चारों ओर फुदक –फुदक कर
परिक्रमा की
और उड़ गया,
फिर एक कौवा आया
हँस –हँस कर
गर्दन को
बार-बार
दायें- बायें कर बातें की
और उड़ गया,
फिर एक कौवा
दूर खड़ा हो
उसको कनखियों
से देखता रहा
और उड़ गया,
एक कौवा
काँव –काँव करता हुआ
उसके सिर के ऊपर से निकला
और उड़ गया।
एक कौवा
आकर अंगरक्षक बन कर बैठ गया
और तभी दूसरे कौवे ने सहचर की
चोंच पर चोंच मारी
और
दोनों उड़ गये।
तभी एक मोटा कौवा आया
उसने न जाने कितने चूजों पर चोंच मारी थी,
वह उसके समीप धीरे –धीरे खिसकता
और नीलकंठ भी धीरे –धीरे दूसरी तरफ खिसकता
और जब उसका खिसकना
जारी रहा
वह उड़ कर दूसरे टीले पर
जाकर बैठ गया
और
वह हठीला कौवा
उड़ गया।
कौवे तो कौवे हैं
कभी वे चूजों के पंजो को
कभी रक्त से सने पंखो को
कभी गर्दन के टुकड़ों
व कूड़े में से उठाये
तंतुओं को चोंच में दबाये
उड़ कर आते
बेचारा
दूर दराज से आया हुआ
एकाकी
उनके इस कुत्सित क्रीड़ा कलरव को
गम्भीर मुद्रा में देखता रहा
रक्त हाड़ का ताण्डव नृत्य होता रहा।
आस पास की समूची धरती
अस्थि टुकड़ों से भरी थी।
कुछ कौवे ऐसे थे
जो जंगल से पहली बार
आये थे
कुछ
को वहाँ
कुछ ही दिन हुये थे
और
बहुत दिनों से बसे
अधिकांश कौओं ने
आस पास बसेरा बना लिया
था
और उनके भोजन का सरल
साधन हो गया था।
परंतु
वह अजनवी नीलकंठ
अजनवी स्थान पर
अजनवियों के बीच
विश्रांति के लिये आया
एक टक निहारता
व सुनता
मुर्गों व मुर्गियों की आवाजें
फड़फड़ाने की आवाजें
और दर्द भरी चीखों को
परंतु
उन ध्वनियों के स्रोत
से अनजान
व रोजाना की
मारकाट से अनभिज्ञ
वह निरीह पक्षी
सचेत
टकटकी लगाकर देखता गगन की ओर।
थे वहाँ
अनुपाती हजार कौवे,पांच बाज व एक गिद्ध।
कूड़े के टीलों व गन्दगी में
मंडराते
समूचे वातावरण को काँव –काँव कर काला कर दिया था
और एक
पल वह भी था
जब काँव –काँव करते अनेक कौवों ने
उसको घेर लिया था
और वह
गोरिल्ला सैनिक की भांति उनके बीच से छिपता हुआ
भय से अज्ञात
फुर्ती से
अभिमन्यु के चक्रब्यूह से बाहर
निकलने से कम नहीं
आकर टीले पर बैठ गया था।
वह एक
सौन्दर्य सिक्त पर्वती पक्षी
फलों का तृषित
टेकड़ी पर बैठा
कभी – कभी पैनी आवाज करता हुआ
उड़ता अपेक्षाकृत स्वच्छ टीलों
पर स्थानांतरण करता
व अति दुखी हो
अश्रुपात करता,
निकट एक गिद्ध
एकाग्रचित्त
कई दिनों से सड़ रहे दुर्गन्धित
एक मोटे चूहे को चट कर रहा
और चीलें व कौवे
मरे व अधमरे पक्षी व चूहों को टुकडे करते, खींचते व
भक्षण करते।
इस वध की भूमि पर
शहर के सकल कचरे को अपनाये हुए
गाजीपुर का यह स्थल
भले ही
कितना ही
क्रूर स्थल हो
इस निर्जन स्थल पर
नीलकंठ का आगमन
शुभ संकेत है
पंक में पंकज सम
वह भी वहाँ
पर्यावरण को परिवर्तित कर
नीड़ बनाकर रहने के उपयुक्त
बना पायेगा।

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