क्योंकि हम चाँद का चेहरा राबोटिक बना रहे हैं
धर्म प्रकाश जैन
आज इन्दिरापुरम डूबा हुआ है धूल के उड़ते हुये बादलों से क्योंकि निर्माण कार्य तेजी से हो रहा है पत्तियों के प्रतिदिन गर्त्त झाड़ने के बावजूद
पर्त्त दर पर्त्त जमती जाती है
सूख रहीं हैं
टूट कर गिर रहीं हैं
पक्षियों ने बहुत दिनों से यहाँ विचरण करना बन्द कर दिया है
लोग यहाँ टहलते नहीं हैं और औरतें घर से बाहर सड़क पर नहीं निकलती धूल प्रदूषण की पराकाष्टा मे जी रहा है इन्दिरापुरम
निर्माण कार्य रत
श्रमजीवियों के बच्चे खाँस –खाँस कर बेहाल हैं हर घर श्वांस कष्ट से ग्रसित हैं
उत्खनक यंत्रॉं पर प्राधिकारी वर्ग बैठा है
और निर्माण कार्य में लगी कम्पनियों में होड़ लगी है कुल बिक्री बढ़ाने में कौन कितना आगे बढ़ता है
सरकारी निर्गम के पहले
कौन कितना लाभ कमा पाता है
“परंतु निर्माण के भी नियम होते हैं आई एस ओ 14000 को ही बड़ी परियोजनाओं की
मान्यता प्राप्त हो
पर्यावरण प्रबन्ध पद्धति अपनाकर
प्रदूषण नियंत्रण कर
मनुष्य का स्वास्थ्य प्रथम प्राथमिकता बनाकर कार्य हो ”
परंतु ये नैतिक नियमों की बातें हैं सरकारी आदेश अल्प हैं
लोग आदतन चुप हैं लोग धीमे स्वर में कभी कुड़बुड़ाते भी हैं और पूँछते हैं क्या निर्माण कार्य ऐसे ही होते हैं ?
निर्माण कम्पनियाँ कहती है
“देश के नियंत्रण प्रदूषण नियम हम नहीं मानते
क्योंकि हम चाँद का चेहरा राबोटिक बना रहे हैं।“
Friday, June 3, 2011
Tuesday, February 22, 2011
चरैवेति – चरैवेति
चरैवेति – चरैवेति
क्या उन संतप्त चेहरों
को देखा है
मातृभूमि छोड़ कर जाते हैं विदेशों को
दर्द अनुभव किया है उन सुर्ख गुलाबों का
गमलों से आ जाते हैं
फूलदानों पर
पूर्ण शशि घोर एकाकीपन लिये
और दूर चला जाता है
भोर में पिता सूर्य के प्रगट होने पर
बिछुड़ने का दुख दोनों को होता है
किंतु,
चरैवेति – चरैवेति.......
क्या उन संतप्त चेहरों
को देखा है
मातृभूमि छोड़ कर जाते हैं विदेशों को
दर्द अनुभव किया है उन सुर्ख गुलाबों का
गमलों से आ जाते हैं
फूलदानों पर
पूर्ण शशि घोर एकाकीपन लिये
और दूर चला जाता है
भोर में पिता सूर्य के प्रगट होने पर
बिछुड़ने का दुख दोनों को होता है
किंतु,
चरैवेति – चरैवेति.......
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