Tuesday, February 22, 2011

चरैवेति – चरैवेति

चरैवेति – चरैवेति




क्या उन संतप्त चेहरों
को देखा है
मातृभूमि छोड़ कर जाते हैं विदेशों को
दर्द अनुभव किया है उन सुर्ख गुलाबों का
गमलों से आ जाते हैं
फूलदानों पर
पूर्ण शशि घोर एकाकीपन लिये
और दूर चला जाता है
भोर में पिता सूर्य के प्रगट होने पर
बिछुड़ने का दुख दोनों को होता है
किंतु,
चरैवेति – चरैवेति.......

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